रिज़वान की पाती (#8755)

*(रिज़वान उत्सव 21 अप्रैल बहाउल्लाह द्वारा अपने अनुयायियों के समक्ष अपने आगमन के उद्देश्य की परम महान उद्घोषणा की याद ताजा कराता है। बहाउल्लाह ने इसे “उत्सवों का सम्राट” कहा है और परम पावन पुस्तक “किताब-ए-अक़दस”में इसकी तुलना उस महान दिवस से की गई है जिसमें समस्त सृजित वस्तुएँ पावनता के सागर में निमग्न हो गईं।) 
 
दिव्य वसंत आ गया है, हे महालेखनी, सर्वदयालु का महापर्व शीघ्र ही निकट आ रहा है। अपने को तैयार कर ले और सम्पूर्ण सृष्टि के समक्ष ईश्वर के नाम को मुखरित कर और उसका यशगान कुछ इस प्रकार कर कि सम्पूर्ण सृष्टि पुनर्जीवित हो एक नवीन चेतना से भर जाये। बोल, चुप न रह। हमारे आशीर्वादयुक्त नाम के क्षितिज पर कृपा का सूर्य चमक उठा है, क्योंकि स्वर्गों के रचयिता तुम्हारे स्वामी के नाम के आभूषण से नामों का साम्राज्य अलंकृत हुआ है। धरती के समस्त राष्ट्रों के सम्मुख उठ खड़ी हो, सर्वमहान नाम की शक्ति से स्वयं को सुसज्जित कर और उनमें से न बन जो प्रतीक्षा करते हैं.....।
यह वह दिवस है जब अदृश्य जगत से आवाज आई है, ”हे वसुंधरा! तू सौभाग्यशाली है कि ईश्वर के पावन पग तुझ पर पड़े हैं और उसके शक्ति सम्पन्न सिंहासन के लिये तू चुनी गई है।“ महिमा का साम्राज्य हर्षोन्मादित हो कह रहा है: ”तेरे लिये मेरा जीवन न्योछावर हो जाये, क्योंकि जो सर्वदयालु का परमप्रिय है उसने तुझ पर अपनी सत्ता स्थापित की है। उस परम पावन नाम के सहारे जिसका वचन अतीत में दिया गया था, जो भविष्य का नियंता है.....।
परम प्रियतम आ गया है, उसके दाहिने हाथ में परम पावन नाम की दिव्य मदिरा है। वह सौभाग्यशाली है जो उसकी ओर उन्मुख हुआ है और जिसने जी भर कर उसका पान किया है। तभी वह हर्षोन्माद में कहता हैः ”तेरी स्तुति हो, हे ईश्वर के संकेतो के दर्शन कराने वाले! ईश्वर के न्याय की सौगंध! सत्य की शक्ति के माध्यम से समस्त गुप्त रहस्य प्रकट कर दिये गये हैं। ईश्वर की समस्त अनुकम्पाएँ उन पर कृपास्वरूप बरसाई गई हैं। शाश्वत जीवन का अमृत-घट मानव को मिला है। सर्वप्रिय ने अमृत-घट की हर बूंद को अपना स्पर्श दिया है। आओ, प्रतीक्षा मत करो, पल भर तो पास आओ इस अमृत-घट के।“.....
हे बहा के लोगो! आनन्द के अतिरेक के प्रवाह में बह चलो और अनन्त आनन्द के दिन का स्मरण करो, जब पुरातन काल के सर्वशक्तिमान ईश्वर ने उस स्थान पर उद्घोष किया था, जहाँ से सर्वदयालु ईश्वर ने सम्पूर्ण विश्व को अपने नाम की ज्योति का प्रकाश दिया था। ईश्वर हमारा साक्षी है, यदि उस ईश्वर के समस्त गुप्त रहस्य प्रकट कर दिये जायें तो धरती के समस्त निवासी मूर्छित और मृतप्राय हो जायेंगे; वही जीवन पायेंगे जिन्हें ईश्वर देना चाहेगा, जो सर्वज्ञ, सर्वप्रज्ञ है!
संदेह से परे ईश्वर के प्रमाणों को प्रकट करने वाली तूलिका पर ईश्वर के शब्दों का कुछ ऐसा प्रभाव पड़ा कि वह आगे कुछ भी न लिख सकी और इन शब्दों के साथ उसने अपनी पाती को समाप्त किया: ”मेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं, मैं सर्वोच्च सर्वशक्तिमान, सर्वश्रेष्ठ और सर्वज्ञाता हूँ।“

-Bahá'u'lláh
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